लेखन एवं प्रकाशन

हिन्दी और संस्कृत में एक समृद्ध ग्रन्थागार

अपने प्रवचनों के साथ-साथ शंकराचार्य जी ने विपुल लिखित साहित्य की भी रचना की है — वेदान्त, नीति, गणित तथा सनातन धर्म के सिद्धान्तों पर। इसका अधिकांश भाग हिन्दी में है और कुछ ग्रन्थ हिन्दी अनुवाद सहित संस्कृत में हैं।

चश्मा पहने निश्चलानन्द सरस्वती, सामने गद्दी पर रखे एक बड़े और बहुपठित ग्रन्थ से पाठ करते हुए, समीप ही एक माइक्रोफ़ोन
प्रवचन से पूर्व ग्रन्थ का पाठ।

शास्त्रीय विद्वत्ता

शंकराचार्य लेखन क्यों करते हैं

शांकर परम्परा मूलतः ग्रन्थों और भाष्यों की परम्परा है। आदि शंकर ने मुख्यतः भाष्य — अर्थात् शास्त्रों पर टीका — के माध्यम से उपदेश दिया, और उनके उत्तराधिकारियों ने उप-टीकाओं, प्रकरण-ग्रन्थों और स्वतन्त्र ग्रन्थों के द्वारा उस कार्य को आगे बढ़ाया। किसी शंकराचार्य के लिए लेखन आध्यात्मिक पद का कोई गौण कार्य नहीं, बल्कि उसके प्राचीनतम कर्तव्यों में से एक है: सिद्धान्त को सटीक रूप में प्रस्तुत करना, शास्त्रार्थ में उसकी रक्षा करना, और उसे अपने युग के प्रश्नों पर लागू करना।

स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती के ग्रन्थ इसी परम्परा में स्थित हैं, यद्यपि उनका विस्तार शास्त्रीय वेदान्त से आगे नीति, राजधर्म, खगोल-ज्योतिष (ज्योतिष) और गणित तक है। उनकी कृतियों की प्रकाशित संख्या विभिन्न स्रोतों में काफ़ी भिन्न है, इसलिए यहाँ कोई संख्या नहीं दी गई है। नीचे दिए गए शीर्षक एक चयन हैं, जिनके लेखकत्व और विषय की पुष्टि पुरी के प्रकाशक स्वस्ति प्रकाशन संस्थान तथा प्रतिष्ठित पुस्तक-विक्रेताओं की सूचियों से की जा सकती है।

चयनित कृतियाँ

शीर्षक देवनागरी में दिए गए हैं, और उनके नीचे शीर्षक के आशय का संक्षिप्त हिन्दी भावार्थ। ये भावार्थ केवल वर्णनात्मक हैं, प्रकाशित शीर्षक नहीं।

गणित एवं ज्योतिष

संस्कृत परम्परा के भीतर से गणित और खगोल-विज्ञान का अन्वेषण करने वाली कृतियाँ।

  • स्वस्तिक गणित“स्वस्तिक गणित — गणित-विषयक ग्रन्थ”

    गणित पर एक ग्रन्थ, संस्कृत में, हिन्दी अनुवाद सहित।

    स्वस्ति प्रकाशन संस्थान, पुरी · 2016
  • गणितादित्य“गणित का सूर्य”

    “गणित का सूर्य” — संस्कृत में, हिन्दी अनुवाद सहित, एक गणितीय ग्रन्थ।

    स्वस्ति प्रकाशन संस्थान, पुरी
  • गणितदर्शन“गणित का दर्शन”

    “गणित का दर्शन” — यथार्थ को समझने के एक मार्ग के रूप में गणित का विवेचन।

    हिन्दी
  • ज्योतिष दर्शन“ज्योतिष का दर्शन”

    “ज्योतिष का दर्शन” — खगोल और काल के वैदिक विज्ञान पर।

    हिन्दी
  • अक्षरागमाङ्कमालिका“अक्षर, आगम और अंकों की माला”

    एक “माला”, जिसका शीर्षक अक्षर (अक्षर), शास्त्र (आगम) और संख्या (अङ्क) को एक सूत्र में जोड़ता है।

    संस्कृत

नीति — आचार एवं राजधर्म

व्यक्ति, परिवार और शासन करने वालों के लिए व्यावहारिक विवेक।

  • नीतिनिधि“नीति की निधि”

    “नीति का भण्डार।”

    हिन्दी
  • नीतिसावित्री“नीति-सावित्री — नीति एवं राजधर्म-विषयक ग्रन्थ”

    नैतिक और राजनीतिक विवेक पर एक ग्रन्थ।

    हिन्दी
  • नीतिचालीसा“नीति के चालीस पद”

    लोकप्रिय चालीसा शैली में, चालीस पदों में निबद्ध नीति-शिक्षा।

    हिन्दी
  • नीति और अध्यात्म“सदाचार और आन्तरिक जीवन”

    “नीति और अध्यात्म” — सदाचरण और आन्तरिक जीवन के पारस्परिक सम्बन्ध पर।

    हिन्दी

वेदान्त एवं मठ-परम्परा

शास्त्रीय दर्शन तथा शंकर द्वारा स्थापित मठों का प्रशासन।

  • शारीरक स्वाराज्यसिद्धि“शारीरक परम्परा में स्वाराज्य की सिद्धि — सारसमाख्या सहित”

    शारीरक परम्परा की एक कृति — यह नाम शंकर द्वारा ब्रह्मसूत्र पर रचित भाष्य को दिया गया है।

    संस्कृत–हिन्दी
  • गुरुवंश-मठाम्नाय-दिग्दर्शन-सेतु-महानुशासनम्“गुरुवंश, मठाम्नाय और महानुशासन का दिग्दर्शक सेतु”

    आचार्यों की वंश-परम्परा, चारों मठों की परम्पराओं तथा महानुशासन — शंकराचार्य पीठों को नियन्त्रित करने वाली अनुशासन-संहिता — पर।

    संस्कृत–हिन्दी

धर्म एवं समाज

व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन में सनातन धर्म।

  • सुखमय जीवन का सनातन सिद्धान्त“सुखी जीवन का शाश्वत सूत्र”

    “सुखमय जीवन का शाश्वत सिद्धान्त।”

    हिन्दी
  • गर्व से कहें — ‘हम हिन्दू हैं’“हिन्दू अस्मिता का गौरवपूर्ण उद्घोष”

    “गर्व से कहें — ‘हम हिन्दू हैं’।” शास्त्रों में वर्णित हिन्दू अस्मिता पर।

    हिन्दी

यहाँ दर्शाए गए विवरणों के अतिरिक्त प्रकाशन-सम्बन्धी अन्य विवरणों की स्वतन्त्र पुष्टि नहीं हो सकी, अतः उन्हें सम्मिलित नहीं किया गया है। सम्पूर्ण ग्रन्थ-सूची और उपलब्धता के लिए गोवर्धन मठ, पुरी से उसकी आधिकारिक वेबसाइट के माध्यम से सम्पर्क करें।

शास्त्रीय ग्रन्थागार

इन ग्रन्थों के आधारभूत शास्त्र

पीठ द्वारा प्रकाशित जीवनी के अनुसार, उनके संन्यास-जीवन के अध्ययन-काल का केन्द्र ये ही ग्रन्थ रहे। उनका अपना लेखन इन्हीं नींवों पर आधारित है।

प्रस्थानत्रयी

प्रस्थानत्रयी

वेदान्त के तीन प्रामाणिक आधार-ग्रन्थ — उपनिषद्, भगवद्गीता और ब्रह्मसूत्र — जिनका अध्ययन शंकर के भाष्यों सहित किया गया। अध्ययन-काल: 1976 से 1981 तक।

पञ्चदशी

पञ्चदशी

पन्द्रह अध्यायों में निबद्ध, चौदहवीं शताब्दी का अद्वैत का प्रकरण-ग्रन्थ, जिसे विद्यारण्य की रचना माना जाता है; सिद्धान्त के स्पष्ट और सुव्यवस्थित प्रतिपादन के लिए यह अत्यन्त समादृत है।

खण्डनखण्डखाद्य

खण्डनखण्डखाद्य

श्रीहर्ष की बारहवीं शताब्दी की तर्कशास्त्रीय उत्कृष्ट कृति, जिसका अध्ययन उन्होंने 1982 से 1987 के बीच स्वामी निरंजनदेव तीर्थ के सान्निध्य में यजुर्वेद के साथ किया।

निश्चलानन्द सरस्वती का श्वेत-श्याम चित्र — सिर पर वस्त्र ओढ़े, पास में खुली पुस्तक रखकर लैपटॉप पर टंकण करते हुए
पास में सन्दर्भ-ग्रन्थ खोलकर लैपटॉप पर कार्य करते हुए।

प्राचीन विद्या, नवीन साधन

आज के विद्वान् की लेखन-मेज़

लैपटॉप पर कार्य करते शंकराचार्य का चित्र उन लोगों को चकित कर सकता है जो पारम्परिक विद्या को समय में जड़ मानते हैं। किन्तु शांकर परम्परा ने सदैव अपने युग के साधनों को अपनाया है — ताड़पत्र की पाण्डुलिपियों से लेकर मुद्रित पुस्तकों तक, और फिर रिकॉर्ड व प्रसारित प्रवचनों तक।

जो अपरिवर्तित रहती है, वह है पद्धति: ग्रन्थ का सूक्ष्म पाठ, तर्क की कसौटी पर परखा गया सिद्धान्त, और इतनी स्पष्टता से प्रस्तुत निष्कर्ष कि दूसरे उसकी परीक्षा कर सकें। इन ग्रन्थों के पीछे के विचारों को दर्शन और शिक्षाएँ खण्डों में जानें।