दर्शन

अद्वैत वेदान्त: एकमेव आत्मा का दर्शन

जिस परम्परा के संरक्षण के लिए गोवर्धन पीठ विद्यमान है, वह एक ही मौलिक और क्रान्तिकारी अन्तर्दृष्टि पर आधारित है: आप जो चेतना हैं, वह सम्पूर्ण जगत् के सत्य से पृथक् नहीं है। आगे इसके प्रमुख विचारों का परिचय दिया गया है, और संस्कृत पारिभाषिक शब्दों को सरल भाषा में समझाया गया है।

भगवा वस्त्रों में गद्दियों पर विराजमान निश्चलानन्द सरस्वती, चिन्तनशील मुद्रा में एक हाथ सिर से टिकाए हुए
Iअद्वैत वेदान्त

अद्वैत वेदान्त

“अद्वय वेदान्त” — यह शिक्षा कि सत्य एक ही है।

वेदान्त का अर्थ है “वेद का अन्त” — वैदिक साहित्य का समापन-भाग, अर्थात् उपनिषद्, और साथ ही उसका चरम प्रयोजन भी। अद्वैत का अर्थ है “दो नहीं”। अद्वैत वेदान्त वह व्याख्या-सम्प्रदाय है, जिसे आदि शंकराचार्य ने शास्त्रीय स्वरूप प्रदान किया और जो उपनिषदों को सर्वोपरि एक ही बात की शिक्षा देने वाला मानता है: कि जीवात्मा और परम सत्य भिन्न नहीं हैं।

यह सम्प्रदाय तीन प्रामाणिक आधार-ग्रन्थों पर टिका है, जिन्हें सम्मिलित रूप से प्रस्थानत्रयी (“तीन प्रस्थान-बिन्दु”) कहा जाता है: उपनिषद्, श्रीमद्भगवद्गीता और बादरायण के ब्रह्मसूत्र। इन तीनों पर शंकर के भाष्य आज भी परम्परा के लिए प्रमाण-बिन्दु हैं, और प्रत्येक शंकराचार्य से अपेक्षा की जाती है कि वे इन्हीं के आधार पर उपदेश दें।

विविधतापूर्ण जगत् के प्रत्यक्ष अनुभव और सत्य के एक होने के दावे में सामंजस्य स्थापित करने के लिए अद्वैत सत्ता के विभिन्न स्तरों में भेद करता है। एक है परमार्थ (पारमार्थिक) स्तर, जिस पर केवल ब्रह्म ही सत्य है; दूसरा दैनिक जीवन का व्यवहार (व्यावहारिक) स्तर, जिसमें जगत् और उसके नियम व्यावहारिक प्रयोजनों के लिए पूर्णतः मान्य हैं; और तीसरा स्वप्न तथा भ्रम का प्रतीति (प्रातिभासिक) स्तर। इसका प्रसिद्ध दृष्टान्त है सन्ध्या के समय सर्प समझी गई रस्सी: वह सर्प कुछ भी नहीं है, ऐसा नहीं — वह भयभीत करता है — फिर भी वह कभी रस्सी के अतिरिक्त कुछ था ही नहीं।

IIब्रह्म

ब्रह्म

अनन्त सत्य — सत्, चित् और पूर्णता।

ब्रह्म परम सत्य का औपनिषदिक नाम है: वह जिससे जगत् उत्पन्न होता है, जिसके द्वारा उसका पालन होता है और जिसमें वह लीन हो जाता है। तैत्तिरीय उपनिषद् (2.1.1) तीन शब्दों में इसकी परिभाषा करता है: सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म — “ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्त है।” परवर्ती वेदान्त इसी अन्तर्दृष्टि को सच्चिदानन्द के रूप में संक्षेपित करता है: सत्, चित् और आनन्द (पूर्णता)।

अद्वैत स्वरूपतः विचारित ब्रह्म — निर्गुण, अर्थात् “गुणरहित”, समस्त वर्णन से परे — और जगत् से सम्बद्ध ब्रह्म — सगुण, अर्थात् “गुणयुक्त”, वह प्रभु (ईश्वर) जो सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता और भक्ति का लक्ष्य है — में भेद करता है। ये दो सत्ताएँ नहीं, बल्कि दो दृष्टिकोणों से देखी गई एक ही सत्ता हैं। यही कारण है कि शंकर-परम्परा में भक्ति और उपासना का वास्तविक और सम्मानित स्थान है, जिसका साक्षी पुरी के हृदय में स्थित जगन्नाथ मन्दिर है।

IIIआत्मा

आत्मा

आत्मा — समस्त अनुभव का साक्षी।

आत्मा ही स्वरूप है: न शरीर, न मन, न व्यक्तित्व, बल्कि वह चेतना जिसमें शरीर, मन और व्यक्तित्व जाने जाते हैं। वेदान्त इसे द्रष्टा (साक्षी) कहता है। विचार आते-जाते रहते हैं; किन्तु उनके आने-जाने का बोध नहीं आता-जाता।

उपनिषद् दो शास्त्रीय विधियों से जिज्ञासु को आत्मा तक ले जाते हैं। पहली विधि अनुभव की तीन अवस्थाओं — जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति — का विश्लेषण करती है और उस चेतना की ओर संकेत करती है जो तीनों में निरन्तर विद्यमान रहती है, जिसे माण्डूक्य उपनिषद् केवल “चतुर्थ” (तुरीय) कहता है। दूसरी विधि, तैत्तिरीय उपनिषद् से, पाँच “आवरणों” (कोशों) — शरीर, प्राण, मन, बुद्धि और आनन्द — को एक-एक कर हटाती है, ताकि यह स्पष्ट हो कि आत्मा इनमें से कोई भी परत नहीं है जो उसे ढके हुए प्रतीत होती है।

भगवा वस्त्र से सिर ढके, विचारमग्न दृष्टि से देखते निश्चलानन्द सरस्वती का निकट से लिया गया चित्र
स्थिरता ही विचार की परम्परागत मुद्रा है।

अद्वैत का केन्द्रीय प्रतिपादन यह है कि यह आत्मा ब्रह्म से अभिन्न है। जो चेतना किसी एक व्यक्ति के अनुभव की साक्षी है, वह अनन्त का कोई खण्ड नहीं; वह स्वयं अनन्त ही है, जो किसी विशेष शरीर और मन से सम्बन्ध के कारण सीमित प्रतीत होती है — जैसे घड़े के भीतर का आकाश तब तक महाकाश से पृथक् प्रतीत होता है, जब तक घड़ा फूट नहीं जाता।

चार महावाक्य

चार महावाक्य, चार प्रधान पीठ

शंकर-परम्परा के प्रत्येक प्रधान मठ को एक वेद और उसके उपनिषदों से लिया गया एक “महावाक्य” सौंपा गया है। चारों महावाक्य आत्मा और ब्रह्म की एक ही अभिन्नता को व्यक्त करते हैं।

प्रज्ञानं ब्रह्म“प्रज्ञान ही ब्रह्म है”

अर्थात् चेतना ही ब्रह्म है। सत्य का स्वरूप वही चेतना है, जिसके द्वारा सब कुछ जाना जाता है।

ऐतरेय उप. 3.3 · ऋग्वेद · पुरी
अहं ब्रह्मास्मि“मैं ब्रह्म हूँ”

साक्षात्कार का वचन, जो उत्तम पुरुष में कहा गया है।

बृहदारण्यक उप. 1.4.10 · यजुर्वेद · शृंगेरी
तत्त्वमसि“वह तू है”

गुरु द्वारा शिष्य को दिया गया उपदेश, जिसे उद्दालक ने अपने पुत्र श्वेतकेतु से बार-बार कहा।

छान्दोग्य उप. 6.8.7 · सामवेद · द्वारका
अयमात्मा ब्रह्म“यह आत्मा ब्रह्म है”

अनुसन्धान का वचन, जो यहीं और अभी विद्यमान आत्मा की ओर संकेत करता है।

माण्डूक्य उप. 2 · अथर्ववेद · ज्योतिर्मठ
IVमाया

माया

एक, अनेक के रूप में कैसे प्रतीत होता है।

यदि सत्य एक है, तो हमें अनेकता और पृथक्ता का अनुभव क्यों होता है? अद्वैत इसका उत्तर माया की अवधारणा से देता है — वह शक्ति जिसके द्वारा एक ब्रह्म नाम-रूपात्मक जगत् के रूप में प्रतीत होता है। व्यक्ति के स्तर पर इसी तत्त्व को अविद्या अर्थात् अज्ञान कहा जाता है: यह सूचना का अभाव नहीं, बल्कि अपने स्वरूप के विषय में एक मूलभूत भ्रान्ति है।

शंकर अपने ब्रह्मसूत्र-भाष्य का आरम्भ अध्यास अर्थात् “आरोपण” के विश्लेषण से करते हैं — आत्मा और अनात्मा का वह अभ्यस्त भ्रम, जिसके कारण हम जो केवल शरीर या मन का धर्म है, उसके लिए कहते हैं “मैं थका हूँ” या “मैं वृद्ध हूँ”। माया को अनिर्वचनीय अर्थात् “जिसका निर्वचन न हो सके” कहा गया है: उसे सत्य नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ज्ञान होने पर वह लुप्त हो जाती है; और असत्य भी नहीं, क्योंकि उसका अनुभव होता है। अतः जगत् को शून्य कहकर नकारा नहीं जाता; उसे ब्रह्म का विवर्त (आभास) समझा जाता है, जैसे सर्प रस्सी का आभास है।

Vआत्मज्ञान

आत्मज्ञान

ज्ञान — मुक्ति कर्म से नहीं, जानने से प्राप्त होती है।

चूँकि बन्धन का मूल अज्ञान है, इसलिए अद्वैत का मत है कि केवल ज्ञान ही उसे दूर कर सकता है — ठीक वैसे ही जैसे अन्धकार को प्रयत्न नहीं, केवल प्रकाश दूर करता है। कर्मकाण्ड, नैतिक आचरण और भक्ति मूल्यवान हैं, क्योंकि वे मन को तैयार करते हैं; किन्तु वे स्वयं उस बोध को उत्पन्न नहीं कर सकते कि व्यक्ति पहले से ही क्या है। वह बोध आत्म-ज्ञान अर्थात् आत्मज्ञान है।

यह ज्ञान आधुनिक अर्थ में कोई रहस्यमय निजी अनुभव नहीं है। परम्परा उपनिषदों को एक प्रमाण — ज्ञान का वैध साधन — मानती है, उस विषय के लिए जहाँ कोई अन्य साधन नहीं पहुँच सकता, ठीक वैसे ही जैसे रंग को जानने का साधन नेत्र हैं। किसी सुयोग्य आचार्य द्वारा उद्घाटित और एक तैयार मन द्वारा समझे गए शास्त्र के वचन आत्मा को प्रत्यक्ष प्रकट कर देते हैं।

VIमोक्ष

मोक्ष

मुक्ति — स्वतन्त्रता ही अपना स्वरूप है।

मोक्ष संसार से मुक्ति है — जन्म, मृत्यु और मिथ्या तादात्म्य से उत्पन्न दुःख का चक्र। अद्वैत में मुक्ति कोई नई अवस्था नहीं जिसे निर्मित करना हो, न कोई स्थान जहाँ पहुँचना हो; यह उस आत्मा का बोध है जो कभी बँधी ही नहीं थी। इसी कारण परम्परा जीवन्मुक्ति अर्थात् “जीवित रहते हुए मुक्ति” की बात करती है: जिसने यह जान लिया है, वह जीवित रहता है और कर्म करता है, किन्तु एक सीमित, पृथक् कर्ता होने के भाव के बिना।

भारतीय परम्परा द्वारा मान्य मानव-जीवन के चार लक्ष्यों — धर्म (सदाचरण), अर्थ (समृद्धि), काम (कामना-पूर्ति) और मोक्ष — में मुक्ति को सर्वोच्च माना गया है, जो शेष तीनों को उनका परम अर्थ प्रदान करती है।

VIIधर्म

धर्म

धारण करने वाली व्यवस्था — और तैयार करने वाला अनुशासन।

धर्म, जो “धारण करना” या “पोषण करना” अर्थ वाली धातु से बना है, वह व्यवस्था है जो व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन को धारण करती है: कर्तव्य, सदाचरण, और शास्त्रों में निर्धारित नैतिक एवं कर्मकाण्डीय ढाँचा। अद्वैत धर्म को एक ओर नहीं रखता। बल्कि वह उसे एक सुनिश्चित भूमिका देता है: कर्तव्य-भाव से किया गया और स्वार्थपूर्ण आसक्ति के बिना अर्पित कर्म — श्रीमद्भगवद्गीता का कर्मयोग — मन को शुद्ध करता है (चित्त-शुद्धि) और उसे आत्मज्ञान के योग्य बनाता है।

यही कारण है कि शंकराचार्य सदा से अद्वैत के आचार्य होने के साथ-साथ धर्म के संरक्षक भी रहे हैं। नीति — आचार-शास्त्र और राजनीति — तथा सनातन धर्म के सिद्धान्तों पर वर्तमान शंकराचार्य का विपुल लेखन इसी परम्परा में है। वे जिन विषयों का विवेचन करते हैं, उनके लिए शिक्षाएँ देखें।

VIIIविचार

वेदान्त-विचार

श्रवण, मनन, निदिध्यासन।

बृहदारण्यक उपनिषद् (2.4.5) का उपदेश है कि आत्मा “श्रोतव्य, मन्तव्य और निदिध्यासितव्य” है — अर्थात् उसके विषय में सुनना, मनन करना और ध्यान करना चाहिए। परम्परा इसे अनुसन्धान (विचार) की तीन चरणों वाली पद्धति के रूप में ग्रहण करती है:

  • श्रवणसुनना — आचार्य के सान्निध्य में शास्त्रों का व्यवस्थित अध्ययन, ताकि यह समझा जा सके कि वे वास्तव में क्या सिखाते हैं।
  • मननचिन्तन — शंकाओं और आपत्तियों पर तर्कपूर्वक विचार करना, जब तक शिक्षा बौद्धिक रूप से सुदृढ़ न हो जाए।
  • निदिध्यासनध्यान — समझे हुए सत्य में तब तक स्थित रहना, जब तक विपरीत विचार-संस्कार विलीन न हो जाएँ।
  • गुरु–शिष्यगुरु और शिष्य का वह सम्बन्ध, जिसके माध्यम से यह पद्धति पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचरित होती आई है।
IXसाधना

ज्ञान और साधना

साधक की चतुर्विध योग्यता।

यदि ज्ञान मुक्त करता है, तो साधना का स्थान क्या है? शंकर का उत्तर है कि साधना ज्ञाता को योग्य बनाती है। शास्त्रीय अद्वैत एक चतुर्विध योग्यता (साधन-चतुष्टय) का वर्णन करता है, जिसे जिज्ञासु को विचार से पूर्व और उसके दौरान विकसित करना चाहिए:

  • विवेकनित्य और अनित्य के बीच विवेक।
  • वैराग्यइस लोक और परलोक के क्षणिक फलों के प्रति अनासक्ति।
  • षट्-सम्पत्तिछह गुण: शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा और समाधान।
  • मुमुक्षुत्वमुक्ति की तीव्र अभिलाषा।

इस दृष्टि से देखें तो मठ का सम्पूर्ण जीवन — उसके अनुशासन, अध्ययन, उपासना और सेवा — इसी तैयारी की पाठशाला है, और उसका आचार्य वह है जिसने स्वयं इस मार्ग पर चलकर देखा है। यह शिक्षा आचार्य से आचार्य तक किस प्रकार पहुँची है, यह जानने के लिए परम्परा एवं वंश-परम्परा पर आगे बढ़ें।